Monday, May 02, 2011

चौपाल से फेसबुक

        गांवो का नाम सुनते ही गाँव से जुडी हर वो चीज आँखों के सामने से गुजर जाती है जो हमने वहां कभी देखी थी वो लहलहाते खेत,....... शाम को वापस आते गाये भैसों के गले में लगे घुघरूओ की आवाज़े,......खेतो से वापस आते किसान ऐसी ही न जाने कितनी ही यादे आँखों में आ जाती है उनमे से ही एक गाँव की वो चौपाले भी है जिन्हें अब के लोग देखने के लिए तरस जाते है                                                                      
                  चौपाले ही थी जो लोंगो को एक दुसरे से जोडती थी और लोंगो पर विश्वास जागाती थी......... लोग एक दूसरे के साथ अपने दुःख सुख बांटते थे और अपने काम से जुडी हुई बातो के अलावा मनोरंजन भी करते थे........बिरहा और आल्हा की ताने छेड़ कर दिनभर की थकान दूर करके पहेलिया भी बुछाया  किया करते थे........ इन चौपालों से ही लोंग एक गाँव की बात को दूसरे गाँव तक जान पाते थे
                  
              अब तो बच्चो को चौपाल का नाम तक नही पता है कि वह होता क्या है............... इस नये इंटरनेट के युग में जब से फेसबुक का आगमन हुआ है तब से इसने लोंगो को एसा जकड़ा है कि लोग साथ रहते हुए भी यही कहते है कि फेसबुक पे बात करेगे................. ये भी लोगो को जानने का एक तरीका ही है लेकिन जो बाते चौपाल में कि जाती थी वह फेसबुक पर नही हो सकती.............जो अपनापन उसमे था वह आज के फेसबुक में नही है और न कभी होगा .